Saturday, 30 May 2020

जैसे को तैसा

एक स्थान पर जीर्णधन नाम का बनिये का लड़का रहता था । धन की खोज में उसने परदेश जाने का विचार किया । उसके घर में विशेष सम्पत्ति तो थी नहीं, केवल एक मन भर भारी लोहे की तराजू थी । उसे एक महाजन के पास धरोहर रखकर वह विदेश चला गया । विदेश स वापिस आने के बाद उसने महाजन से अपनी धरोहर वापिस मांगी । महाजन ने कहा----"वह लोहे की तराजू तो चूहों ने खा ली ।" 
बनिये का लड़का समझ गया कि वह उस तराजू को देना नहीं चाहता । किन्तु अब उपाय कोई नहीं था । कुछ देर सोचकर उसने कहा---"कोई चिन्ता नहीं । चुहों ने खा डाली तो चूहों का दोष है, तुम्हारा नहीं । तुम इसकी चिन्ता न करो ।" 
थोड़ी देर बाद उसने महाजन से कहा----"मित्र ! मैं नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ । तुम अपने पुत्र धनदेव को मेरे साथ भेज दो, वह भी नहा आयेगा ।" 
महाजन बनिये की सज्जनता से बहुत प्रभावित था, इसलिए उसने तत्काल अपने पुत्र को उनके साथ नदी-स्नान के लिए भेज दिया । 
बनिये ने महाजन के पुत्र को वहाँ से कुछ दूर ले जाकर एक गुफा में बन्द कर दिया । गुफा के द्वार पर बड़ी सी शिला रख दी, जिससे वह बचकर भाग न पाये । उसे वहाँ बंद करके जब वह महाजन के घर आया तो महाजन ने पूछा---"मेरा लड़का भी तो तेरे साथ स्नान के लिए गया था, वह कहाँ है ?" 
बनिये ने कहा ----"उसे चील उठा कर ले गई है ।" 
महाजन ---"यह कैसे हो सकता है ? कभी चील भी इतने बड़े बच्चे को उठा कर ले जा सकती है ?" 
बनिया---"भले आदमी ! यदि चील बच्चे को उठाकर नहीं ले जा सकती तो चूहे भी मन भर भारी तराजू को नहीं खा सकते । तुझे बच्चा चाहिए तो तराजू निकाल कर दे दे ।" 
इसी तरह विवाद करते हुए दोनों राजमहल में पहुँचे । वहाँ न्यायाधिकारी के सामने महाजन ने अपनी दुःख-कथा सुनाते हुए कहा कि, "इस बनिये ने मेरा लड़का चुरा लिया है ।" 
धर्माधिकारी ने बनिये से कहा ---"इसका लड़का इसे दे दो । 
बनिया बोल----"महाराज ! उसे तो चील उठा ले गई है ।" 
धर्माधिकारी ----"क्या कभी चील भी बच्चे को उठा ले जा सकती है ?" 
बनिया ----"प्रभु ! यदि मन भर भारी तराजू को चूहे खा सकते हैं तो चील भी बच्चे को उठाकर ले जा सकती है ।" 
धर्माधिकारी के प्रश्‍न पर बनिये ने अपनी तराजू का सब वृत्तान्त कह सुनाया । 

शिक्षा :- जैसे को तैसा

मुर्ख बन्दर

किसी राजा के राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रहता था । वह राजा का बहुत विश्वास-पात्र और भक्त था । अन्तःपुर में भी वह बेरोक-टोक जा सकता था ।
एक दिन जब राजा सो रहा था और बन्दर पङखा झल रहा था तो बन्दर ने देखा, एक मक्खी बार-बार राजा की छाती पर बैठ जाती थी । पंखे से बार-बार हटाने पर भी वह मानती नहीं थी, उड़कर फिर वहीं बैठी जाती थी ।
बन्दर को क्रोध आ गया । उसने पंखा छोड़ कर हाथ में तलवार ले ली; और इस बार जब मक्खी राजा की छाती पर बैठी तो उसने पूरे बल से मक्खी पर तलवार का हाथ छोड़ दिया । मक्खी तो उड़ गई, किन्तु राजा की छाती तलवार की चोट से दो टुकडे़ हो गई । राजा मर गया ।

शिक्षा :- "मूर्ख मित्र की अपेक्षा विद्वान्‌ शत्रु ज्यादा अच्छा होता है।"

Monday, 13 April 2020

भावना का महत्त्व

।। भावना का महत्व ।। 
एक था साधु और एक थी नर्तकी । साधु दिन भर उपदेश देता रहता और नर्तकी लोगों के सामने नाचकर उनका मन बहलाती थी । दोनों की मृत्यु लगभग एक ही साथ हुई । मरकर जब ये दोनों यमलोक पहुंचे तो इनके कर्मो और उनके पीछे छिपी भावनाओं के आधार पर इन्हें स्वर्ग या नरक दिए जाने की बात कही गई । साधु खुद को स्वर्ग मिलने को लेकर पूरा आश्वस्त था । वहीं नर्तकी अपने मन में ऐसा कुछ भी विचार नहीं कर रही थी । उसे इंतजार था तो सिर्फ फैसले का । तभी घोषणा हुई कि साधु को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है । इस फैसले से आहत साधू ने यमराज से क्रोधित होते हुए सवाल किया , ' यह कैसा न्याय है ? मैं जीवन भर लोगों को उपदेश देता रहा और मुझे नरक मिला ? जबकि यह स्त्री जीवन भर लोगों को रिझाने के लिए नाचती रही और इसे स्वर्ग दिया जा रहा है ? ऐसा क्यों ? ' यमराज ने शांतभाव से उत्तर दिया , ' यह नर्तकी अपना पेट भरने के लिए नाचती थी लेकिन इसके मन में यही भावना थी कि मैं इस नृत्य को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रही हूं । जबकि तुम उपदेश देते हुए भी यह सोचते थे कि इस संन्यास को कुछ समय बाद लेता तो उस नर्तकी का नृत्य देख पाता । यहां फैसले में तुम्हारे कर्मों से ज्यादा भावनाएं भारी पड़ी हैं । ' | 

शिक्षा :- किसी भी काम को करते समय आपकी भावना का विशेष महत्व है ।

मीठी हो बोली

।। मीठी हो बोली ।।
 एक आदमी का स्वभाव बड़ा चंचल था । उसकी वाणी भी कर्कश थी । वह सबके साथ कठोर व्यवहार करता । छोटे - बड़े किसी का लिहाज नहीं । परिणाम वही हुआ , जो होना चाहिए था । सबके मन में उसके लिए कटुता पैदा हो गई । वह जिधर जाता , लोग उससे मुंह फेर लेते । उसके तने हुए चेहरे से लोगों के मन में उसके लिए तिरस्कार पैदा हो गया । वह यह सब देख दुखी होता लेकिन बेचारा अपने स्वभाव से लाचार था । अप्रिय शब्द बोलने और कड़वी भाषा का प्रयोग करने से वह खुद को रोक नहीं पाता था । एक दिन एक साधु आए । वह उनसे मिलने गया और बोला , ' यह दुनिया बहुत बुरी है । इसने मुझे बहुत सताया है कि मैं आपको कुछ कह भी नहीं सकता । ' उस व्यक्ति के चेहरे की कठोरता देख व तीखी वाणी सुन संत समझ गए कि उसे रोग क्या है । वे उससे बोले , ' दीपक में रुई की बाती डालो , इसमें पानी भरो और फिर जलाओ । ' यह सुनकर आदमी हैरान हुआ कि साधु ऐसा क्यों कह रहे हैं । फिर सोचा कि शायद कोई चमत्कार हो । उसने ऐसा ही किया लेकिन बाती नहीं जली । साधु ने कहा , ' पगले जब तक दीए में स्नेह या तेल नहीं पड़ेगा तो यह जलेगा कैसे ? तुम्हारे दीए में पानी पड़ा है । इसे फेंककर इसमें स्नेह भरो । वह आदमी संत की बात का अर्थ समझ गया था । 

शिक्षा :- हमेशा मीठी वाणी ही बोलें ।

निंदा का डर

।। निंदा का डर ।।
अब्राहम लिंकन ने एक ऐसे व्यक्ति को अपना रक्षामंत्री नियुक्त किया , जो उनका बहुत बड़ा आलोचक था । वह हर समय राष्ट्रपति की पीठ पीछे उनकी निंदा करता रहता । लिंकन के समर्थकों को यह बात पसंद नहीं थी । वे परेशान रहते थे कि लिंकन ने आखिर ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया ही क्यों , जो उनका सम्मान ही नहीं करता । आखिरकर एक दिन उन्होंने लिंकन से शिकायत कर ही दी । लिंकन ने अपने समर्थकों को समझाया , ' शायद आपका यह कहना सही है कि वह मेरा प्रशंसक नहीं है और मुझसे घृणा करता है । लेकिन यह मत भूलिए कि वह एक सच्चा राष्ट्रभक्त होने के साथ - साथ एक योग्य मंत्री भी है । उसे जो काम दिया जाता है वह उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करता है । ' लिंकन ने आगे कहा , ' हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य एक व्यक्ति के महिमागान से कहीं ऊपर हैं । ' लिंकन ने अपने समर्थकों से पूछा , ' अब आप मुझे सोच कर बताएं कि अमरीका को लिंकन भक्तों की जरूरत है या फिर उन देशभक्तों की जो उसके हित के लिए काम करें ? ' लिंकन की बात सुनकर उनके समर्थक कुछ कह तो न सके , लेकिन उनके मन लिंकन के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई थी । 

शिक्षा :- अपनी आलोचना मात्र से डगमगा जाना कमजोरी की निशानी है ।

योग्यता का खेल

।। योग्यता का खेल ।। 
यह उन दिनों की बात है जब रूजवेल्ट अमरीका के राष्ट्रपति थे । एक राजदूत रूजवेल्ट से मिलने आया । वह उनसे मिलकर बहुत प्रभावित हुआ । उसने पूछा , ' यदि आप आज्ञा दें तो मैं आप से एक निजी प्रश्न पूछू ? ' रूजवेल्ट बोले , ' आप निसंकोच पूछ सकते हैं । ' राजदूत बोला , ' सर , क्या जीवन में सफलता पाने के लिए असाधारण योग्यता जरूरी है ? क्या आप भी असाधारण योग्यता के कारण इस पद पर पहुंचे हैं या फिर साधारण होने पर भी असाधारण योग्यता हासिल की जा सकती है ? ' रूजवेल्ट राजदूत का प्रश्न सुनकर मुस्कुराए व बोले , ' जीवन में सफलता पाने या महान बनने के पीछे दो प्रमुख बातें महत्व रखती हैं । पहली तो यह कि असाधारण प्रतिभा वाले लोग कठिन से कठिन समस्याओं को भी अपनी प्रतिभा व कौशल के बूते हल कर एक महान शख्सियत के रूप में उभरते हैं । लेकिन दूसरी तरह से भी सफलता तब मिल सकती है , जब साधारण योग्यता वाला मनुष्य किसी काम को करने में तन - मन व एकाग्रता से जुट जाए । ऊपर से बेहद मुश्किल दिखने वाला कार्य भी वास्तव में सहज ही होता है । मुझ में भी कोई असाधारण प्रतिभा नहीं है । हां , मुझमें काम करने का जनून है और मेरे इसी जनून ने मुझे इस पद पर पहुंचाया है । ' राजदूत रूजवेल्ट के जवाब से संतुष्ट हो गया । 

शिक्षा :- लगन से असाधारण सफलता पाई जा सकती है ।

गुरु की भूमिका

।। गुरु की भूमिका ।। 
उज्जैन के राजा ने अपने जिद्दी व शरारती राजकुमार शातवाहन को गुरु शिवदास के आश्रम में शिक्षा के लिए भेजा । शिवदास राजकुमार की बुरी आदतों से परिचित हो गए थे । उन्होंने उसे सुधारने के लिए कई बार दंडित किया । वह अपने प्रयास में सफल रहे और राजकुमार के आचरण में बदलाव आ गया । इससे राजा बहुत खुश हुए । कुछ समय बाद शातवाहन सिंहासन पर बैठा । उधर , गुरु शिवदास की स्थिति दयनीय हो गई । वह वृद्ध हो गए और भिक्षा मांगकर पेट भरने लगे । एक दिन वह भिक्षा मांगते हुए राजा शातवाहन के पास पहुंच गए । अपने गुरु को देख शातवाहन के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव आए , लेकिन जल्द ही पुरानी बातें याद करके वह गुस्से से भर उठा । उसने कहा , ' याद है गुरुजी , आप मुझे कितना पीटते थे ? मझे देखिए , आज मैं कहां पहुंच गया और आप कहां रह गए । ' इस पर गुरु बोले , ' हां पुत्र , तुम सही कह रहे हो । मुझे तो तुम्हें एक सफल राजा के रूप में देखकर अत्यंत खुशी हो रही है । तुम मेरी शिक्षा व डांट से सही मार्ग पर आए थे और इसलिए आज प्रजा बेहद संतुष्ट है । यदि तुम पहले जैसे होते तो तुम्हारे राज्य में बहुत कष्ट होते । ' गुरु की बात सुन राजा बेहद शर्मिंदा हुआ और उनसे क्षमा मांगकर राजमहल में ले गया ।

शिक्षा :- गुरु हमें सन्मार्ग पर लाते हैं ।

जैसे को तैसा

एक स्थान पर जीर्णधन नाम का बनिये का लड़का रहता था । धन की खोज में उसने परदेश जाने का विचार किया । उसके घर में विशेष सम्पत्ति तो थी नहीं, केव...