Saturday, 30 May 2020

जैसे को तैसा

एक स्थान पर जीर्णधन नाम का बनिये का लड़का रहता था । धन की खोज में उसने परदेश जाने का विचार किया । उसके घर में विशेष सम्पत्ति तो थी नहीं, केवल एक मन भर भारी लोहे की तराजू थी । उसे एक महाजन के पास धरोहर रखकर वह विदेश चला गया । विदेश स वापिस आने के बाद उसने महाजन से अपनी धरोहर वापिस मांगी । महाजन ने कहा----"वह लोहे की तराजू तो चूहों ने खा ली ।" 
बनिये का लड़का समझ गया कि वह उस तराजू को देना नहीं चाहता । किन्तु अब उपाय कोई नहीं था । कुछ देर सोचकर उसने कहा---"कोई चिन्ता नहीं । चुहों ने खा डाली तो चूहों का दोष है, तुम्हारा नहीं । तुम इसकी चिन्ता न करो ।" 
थोड़ी देर बाद उसने महाजन से कहा----"मित्र ! मैं नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ । तुम अपने पुत्र धनदेव को मेरे साथ भेज दो, वह भी नहा आयेगा ।" 
महाजन बनिये की सज्जनता से बहुत प्रभावित था, इसलिए उसने तत्काल अपने पुत्र को उनके साथ नदी-स्नान के लिए भेज दिया । 
बनिये ने महाजन के पुत्र को वहाँ से कुछ दूर ले जाकर एक गुफा में बन्द कर दिया । गुफा के द्वार पर बड़ी सी शिला रख दी, जिससे वह बचकर भाग न पाये । उसे वहाँ बंद करके जब वह महाजन के घर आया तो महाजन ने पूछा---"मेरा लड़का भी तो तेरे साथ स्नान के लिए गया था, वह कहाँ है ?" 
बनिये ने कहा ----"उसे चील उठा कर ले गई है ।" 
महाजन ---"यह कैसे हो सकता है ? कभी चील भी इतने बड़े बच्चे को उठा कर ले जा सकती है ?" 
बनिया---"भले आदमी ! यदि चील बच्चे को उठाकर नहीं ले जा सकती तो चूहे भी मन भर भारी तराजू को नहीं खा सकते । तुझे बच्चा चाहिए तो तराजू निकाल कर दे दे ।" 
इसी तरह विवाद करते हुए दोनों राजमहल में पहुँचे । वहाँ न्यायाधिकारी के सामने महाजन ने अपनी दुःख-कथा सुनाते हुए कहा कि, "इस बनिये ने मेरा लड़का चुरा लिया है ।" 
धर्माधिकारी ने बनिये से कहा ---"इसका लड़का इसे दे दो । 
बनिया बोल----"महाराज ! उसे तो चील उठा ले गई है ।" 
धर्माधिकारी ----"क्या कभी चील भी बच्चे को उठा ले जा सकती है ?" 
बनिया ----"प्रभु ! यदि मन भर भारी तराजू को चूहे खा सकते हैं तो चील भी बच्चे को उठाकर ले जा सकती है ।" 
धर्माधिकारी के प्रश्‍न पर बनिये ने अपनी तराजू का सब वृत्तान्त कह सुनाया । 

शिक्षा :- जैसे को तैसा

मुर्ख बन्दर

किसी राजा के राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रहता था । वह राजा का बहुत विश्वास-पात्र और भक्त था । अन्तःपुर में भी वह बेरोक-टोक जा सकता था ।
एक दिन जब राजा सो रहा था और बन्दर पङखा झल रहा था तो बन्दर ने देखा, एक मक्खी बार-बार राजा की छाती पर बैठ जाती थी । पंखे से बार-बार हटाने पर भी वह मानती नहीं थी, उड़कर फिर वहीं बैठी जाती थी ।
बन्दर को क्रोध आ गया । उसने पंखा छोड़ कर हाथ में तलवार ले ली; और इस बार जब मक्खी राजा की छाती पर बैठी तो उसने पूरे बल से मक्खी पर तलवार का हाथ छोड़ दिया । मक्खी तो उड़ गई, किन्तु राजा की छाती तलवार की चोट से दो टुकडे़ हो गई । राजा मर गया ।

शिक्षा :- "मूर्ख मित्र की अपेक्षा विद्वान्‌ शत्रु ज्यादा अच्छा होता है।"

Monday, 13 April 2020

भावना का महत्त्व

।। भावना का महत्व ।। 
एक था साधु और एक थी नर्तकी । साधु दिन भर उपदेश देता रहता और नर्तकी लोगों के सामने नाचकर उनका मन बहलाती थी । दोनों की मृत्यु लगभग एक ही साथ हुई । मरकर जब ये दोनों यमलोक पहुंचे तो इनके कर्मो और उनके पीछे छिपी भावनाओं के आधार पर इन्हें स्वर्ग या नरक दिए जाने की बात कही गई । साधु खुद को स्वर्ग मिलने को लेकर पूरा आश्वस्त था । वहीं नर्तकी अपने मन में ऐसा कुछ भी विचार नहीं कर रही थी । उसे इंतजार था तो सिर्फ फैसले का । तभी घोषणा हुई कि साधु को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है । इस फैसले से आहत साधू ने यमराज से क्रोधित होते हुए सवाल किया , ' यह कैसा न्याय है ? मैं जीवन भर लोगों को उपदेश देता रहा और मुझे नरक मिला ? जबकि यह स्त्री जीवन भर लोगों को रिझाने के लिए नाचती रही और इसे स्वर्ग दिया जा रहा है ? ऐसा क्यों ? ' यमराज ने शांतभाव से उत्तर दिया , ' यह नर्तकी अपना पेट भरने के लिए नाचती थी लेकिन इसके मन में यही भावना थी कि मैं इस नृत्य को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रही हूं । जबकि तुम उपदेश देते हुए भी यह सोचते थे कि इस संन्यास को कुछ समय बाद लेता तो उस नर्तकी का नृत्य देख पाता । यहां फैसले में तुम्हारे कर्मों से ज्यादा भावनाएं भारी पड़ी हैं । ' | 

शिक्षा :- किसी भी काम को करते समय आपकी भावना का विशेष महत्व है ।

मीठी हो बोली

।। मीठी हो बोली ।।
 एक आदमी का स्वभाव बड़ा चंचल था । उसकी वाणी भी कर्कश थी । वह सबके साथ कठोर व्यवहार करता । छोटे - बड़े किसी का लिहाज नहीं । परिणाम वही हुआ , जो होना चाहिए था । सबके मन में उसके लिए कटुता पैदा हो गई । वह जिधर जाता , लोग उससे मुंह फेर लेते । उसके तने हुए चेहरे से लोगों के मन में उसके लिए तिरस्कार पैदा हो गया । वह यह सब देख दुखी होता लेकिन बेचारा अपने स्वभाव से लाचार था । अप्रिय शब्द बोलने और कड़वी भाषा का प्रयोग करने से वह खुद को रोक नहीं पाता था । एक दिन एक साधु आए । वह उनसे मिलने गया और बोला , ' यह दुनिया बहुत बुरी है । इसने मुझे बहुत सताया है कि मैं आपको कुछ कह भी नहीं सकता । ' उस व्यक्ति के चेहरे की कठोरता देख व तीखी वाणी सुन संत समझ गए कि उसे रोग क्या है । वे उससे बोले , ' दीपक में रुई की बाती डालो , इसमें पानी भरो और फिर जलाओ । ' यह सुनकर आदमी हैरान हुआ कि साधु ऐसा क्यों कह रहे हैं । फिर सोचा कि शायद कोई चमत्कार हो । उसने ऐसा ही किया लेकिन बाती नहीं जली । साधु ने कहा , ' पगले जब तक दीए में स्नेह या तेल नहीं पड़ेगा तो यह जलेगा कैसे ? तुम्हारे दीए में पानी पड़ा है । इसे फेंककर इसमें स्नेह भरो । वह आदमी संत की बात का अर्थ समझ गया था । 

शिक्षा :- हमेशा मीठी वाणी ही बोलें ।

निंदा का डर

।। निंदा का डर ।।
अब्राहम लिंकन ने एक ऐसे व्यक्ति को अपना रक्षामंत्री नियुक्त किया , जो उनका बहुत बड़ा आलोचक था । वह हर समय राष्ट्रपति की पीठ पीछे उनकी निंदा करता रहता । लिंकन के समर्थकों को यह बात पसंद नहीं थी । वे परेशान रहते थे कि लिंकन ने आखिर ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया ही क्यों , जो उनका सम्मान ही नहीं करता । आखिरकर एक दिन उन्होंने लिंकन से शिकायत कर ही दी । लिंकन ने अपने समर्थकों को समझाया , ' शायद आपका यह कहना सही है कि वह मेरा प्रशंसक नहीं है और मुझसे घृणा करता है । लेकिन यह मत भूलिए कि वह एक सच्चा राष्ट्रभक्त होने के साथ - साथ एक योग्य मंत्री भी है । उसे जो काम दिया जाता है वह उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करता है । ' लिंकन ने आगे कहा , ' हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य एक व्यक्ति के महिमागान से कहीं ऊपर हैं । ' लिंकन ने अपने समर्थकों से पूछा , ' अब आप मुझे सोच कर बताएं कि अमरीका को लिंकन भक्तों की जरूरत है या फिर उन देशभक्तों की जो उसके हित के लिए काम करें ? ' लिंकन की बात सुनकर उनके समर्थक कुछ कह तो न सके , लेकिन उनके मन लिंकन के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई थी । 

शिक्षा :- अपनी आलोचना मात्र से डगमगा जाना कमजोरी की निशानी है ।

योग्यता का खेल

।। योग्यता का खेल ।। 
यह उन दिनों की बात है जब रूजवेल्ट अमरीका के राष्ट्रपति थे । एक राजदूत रूजवेल्ट से मिलने आया । वह उनसे मिलकर बहुत प्रभावित हुआ । उसने पूछा , ' यदि आप आज्ञा दें तो मैं आप से एक निजी प्रश्न पूछू ? ' रूजवेल्ट बोले , ' आप निसंकोच पूछ सकते हैं । ' राजदूत बोला , ' सर , क्या जीवन में सफलता पाने के लिए असाधारण योग्यता जरूरी है ? क्या आप भी असाधारण योग्यता के कारण इस पद पर पहुंचे हैं या फिर साधारण होने पर भी असाधारण योग्यता हासिल की जा सकती है ? ' रूजवेल्ट राजदूत का प्रश्न सुनकर मुस्कुराए व बोले , ' जीवन में सफलता पाने या महान बनने के पीछे दो प्रमुख बातें महत्व रखती हैं । पहली तो यह कि असाधारण प्रतिभा वाले लोग कठिन से कठिन समस्याओं को भी अपनी प्रतिभा व कौशल के बूते हल कर एक महान शख्सियत के रूप में उभरते हैं । लेकिन दूसरी तरह से भी सफलता तब मिल सकती है , जब साधारण योग्यता वाला मनुष्य किसी काम को करने में तन - मन व एकाग्रता से जुट जाए । ऊपर से बेहद मुश्किल दिखने वाला कार्य भी वास्तव में सहज ही होता है । मुझ में भी कोई असाधारण प्रतिभा नहीं है । हां , मुझमें काम करने का जनून है और मेरे इसी जनून ने मुझे इस पद पर पहुंचाया है । ' राजदूत रूजवेल्ट के जवाब से संतुष्ट हो गया । 

शिक्षा :- लगन से असाधारण सफलता पाई जा सकती है ।

गुरु की भूमिका

।। गुरु की भूमिका ।। 
उज्जैन के राजा ने अपने जिद्दी व शरारती राजकुमार शातवाहन को गुरु शिवदास के आश्रम में शिक्षा के लिए भेजा । शिवदास राजकुमार की बुरी आदतों से परिचित हो गए थे । उन्होंने उसे सुधारने के लिए कई बार दंडित किया । वह अपने प्रयास में सफल रहे और राजकुमार के आचरण में बदलाव आ गया । इससे राजा बहुत खुश हुए । कुछ समय बाद शातवाहन सिंहासन पर बैठा । उधर , गुरु शिवदास की स्थिति दयनीय हो गई । वह वृद्ध हो गए और भिक्षा मांगकर पेट भरने लगे । एक दिन वह भिक्षा मांगते हुए राजा शातवाहन के पास पहुंच गए । अपने गुरु को देख शातवाहन के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव आए , लेकिन जल्द ही पुरानी बातें याद करके वह गुस्से से भर उठा । उसने कहा , ' याद है गुरुजी , आप मुझे कितना पीटते थे ? मझे देखिए , आज मैं कहां पहुंच गया और आप कहां रह गए । ' इस पर गुरु बोले , ' हां पुत्र , तुम सही कह रहे हो । मुझे तो तुम्हें एक सफल राजा के रूप में देखकर अत्यंत खुशी हो रही है । तुम मेरी शिक्षा व डांट से सही मार्ग पर आए थे और इसलिए आज प्रजा बेहद संतुष्ट है । यदि तुम पहले जैसे होते तो तुम्हारे राज्य में बहुत कष्ट होते । ' गुरु की बात सुन राजा बेहद शर्मिंदा हुआ और उनसे क्षमा मांगकर राजमहल में ले गया ।

शिक्षा :- गुरु हमें सन्मार्ग पर लाते हैं ।

राजा के मित्र

।। राजा के मित्र ।।
 राजा आदर्श सेन के राज्य में प्रजा " बहुत खुशहाल और संतुष्ट थी । वहां कभी किसी तरह का तनाव नहीं होता था । यह बात पड़ोसी राज्य के राजा कुशलसेन तक भी पहुंची । उसके यहां आए दिन झगड़े होते थे और प्रजा बहुत दुखी थी । राजा कुशल सेन अपने पड़ोसी राज्य की सुख - शांति व खुशहाली का राज जानने आदर्श सेन के पास पहुंचा और बोला , ' मेरे यहां हर ओर दुख - दर्द और बीमारी फैली है । पूरी राज्य में त्राहि त्राहि मची है । कृपया मुझे अपने राज्य की सुख - शांति का राज बताएं । कुशल सेन की बात सुन राजा आदर्श सेन मुस्कुराकर बोले , ' मेरे राज्य में शांति मेरे चार मित्रों के कारण आई है । इस बात से कुशल सेन की उत्सुकता बढ़ गई । उसने कहा , ' कौन हैं आपके वे मित्र ? क्या वे मेरी मदद नहीं कर सकते ? ' आदर्श सेन ने कहा , ' जरूर कर सकते हैं । सुनिए , मेरा पहला मित्र है - सत्य । वह मुझे कभी असत्य नहीं बोलने देता । दूसरा मित्र है - प्रेम , जो मुझे कभी घृणा का अवसर नहीं देता । तीसरा मित्र न्याय है , जो कभी अन्याय नहीं करने देता । यह मेरे आंख - कान हमेशा खुले रखता है । चौथा मित्र है - त्याग । त्याग की भावना मुझे ईर्ष्या से बचाती है । ये चारों मिलकर मेरा साथ देते हैं और मेरे राज्य की रक्षा करते हैं । ' कुशल सेन को राजा की सफलता का रहस्य समझ आ गया था । 

शिक्षा :- इंसान को सद्गुणों को जीवन में उतारना चाहिए ।

विचारों की उपयोगिता

।। विचारों की उपयोगिता ।।
 एक राजा इस बात से बहुत परेशान था कि धर्म व दर्शन पर विचारकों में सहमति क्यों नहीं बनती । उसने विभिन्न धर्मों के उपदेशकों को कारागार में डालते हुए कहा , ' जब तक तुम सब एक मत नहीं हो जाते तब तक यहीं रहो । ' किसी विद्वान ने यह बात सुनी तो राजा के पास आया । राजा ने उससे पूछा कि आपको मेरा नगर कैसा लगा ? विद्वान बोला , ' नगर सुंदर तो है लेकिन अव्यवस्थित है । राजा ने पूछा , ' कैसे ? ' विद्वान बोला , ' बाजार अच्छे नहीं हैं । सैंकड़ों दुकानें हैं । इतनी दुकानों की क्या जरूरत ? एक ही बड़ी दुकान बना देते तो बाजार सुंदर लगता । ' राजा ने कहा , ' यह बात अव्यावहारिक है । दुनिया चलाने के लिए सैंकड़ों चीजें चाहिए । किसी को आटा तो किसी को दाल , किसी को सोना तो किसी को चांदी । एक ही दुकान में ये सब चीजें कैसे रखी जा सकती हैं ? अलग - अलग दुकानें होने से दुविधा नहीं रहती और सबकी जरूरत पूरी हो जाती है । ' विद्वान ने कहा , ' आपका कथन सही है । जब आप सभी दुकानों को एक नहीं कर सकते तो भला विभिन्न विचारों को एक कैसे कर सकते हैं ? इन सबकी अपनी - अपनी उपयोगिता है । ' राजा को बात समझ आ गई । उसने उपदेशकों को मुक्त करवा दिया । 

शिक्षा :- दूसरों के विचारों को भी समझें ।

नियम है नियम

।। नियम है नियम ।।
बात तब की है , जब लाल बहादुर शास्त्री रेलमंत्री थे । वे अपने नियमों के पालन के लिए तो प्रतिबद्ध थे ही , साथ ही दूसरों से भी ऐसी ही आशा रखते थे । एक बार उन्हें बनारस से रेल में कहीं जाना था । बहुत कोशिश के बाद भी वे समय से स्टेशन नहीं पहुंच पाए । गाड़ी का सिग्नल हो गया था लेकिन जैसे ही गार्ड को पता चला कि मंत्री महोदय आ रहे हैं तो उसने हरी झंडी नीची कर दी । वह शास्त्रीजी का इंतजार करने लगा और इधर लोग सिगनल हरा होने के बावजूद खड़ी गाड़ी से परेशान होने लगे । कुछ देर में शास्त्रीजी वहां पहुंचे और ट्रेन में सवार होने लगे । तभी वह गार्ड भागकर उनके पास आया और बोला , ' मुझे पता चला था कि आप आ रहे हैं , इसलिए गाड़ी रुकवाए रखी । शास्त्रीजी ने गार्ड को देखा , लेकिन कहा कुछ नहीं । गार्ड ने सोचा कि अब तो तरक्की पक्की है । अगले ही दिन उसकी यह सारी खुशी गायब हो गई जब उसे उसके पद से हटाए जाने की सूचना मिली । शास्त्रीजी ने उसे उसका काम ठीक से न करने पर पद से हटा दिया था । उनका मानना था कि किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति को अपने कर्तव्य की अवहेलना नहीं करनी चाहिए । 

शिक्षा :- अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा के साथ करें ।

गुलाम की सीख

।। गुलाम की सीख ।।
बादशाह हजरत इब्राहिम बेहद उदार थे । वे खुद भी सादा जीवन जीते और अपने सहयोगियों को भी ऐसा करने को कहते । उनमें जरा भी अहंकार नहीं था । जनकल्याण के कामों से जब भी समय मिलता ईश्वर की इबादत करते और विद्वानों के साथ चर्चा करते । वे हमेशा कुछ नया सीखने को तैयार रहते थे । तब गुलामी प्रथा चलन में थी । उन्होंने एक गुलाम खरीदा । उससे पूछा , ' तेरा नाम क्या है ? ' उसने कहा , ' जो आप पुकारें । ' बादशाह ने पूछा , ' तू खाएगा क्या ? ' गुलाम बोला , ' जो आप खिलाएं । ' बादशाह ने पूछा , ' तुझे कपड़े कैसे पसंद है ? ' गुलाम बोला , ' जो आप पहनाएं । ' बादशाह दंग रह गए । उन्होंने पूछा , ' तू आखिर चाहता क्या है ? ' गुलाम सिर झुकाकर बोला , ' गुलाम की भला क्या चाह ? ' बादशाह गद्दी से उतरकर उसे गले लगाते हुए बोले , ' आज से तू मेरा उस्ताद है । तूने जाने अनजाने में मुझे बहुत बड़ी बात सिखा दी । किसी इंसान को हक नहीं कि वह दूसरे को अपना गुलाम बनाए । तेरी बातों से मुझे पता चला कि खुदा के साथ हमारा रिश्ता कैसा होना चाहिए ? ज्यादा पाने की चाह रखने के बजाय हमें खुद को पूरी तरह से उसी के हवाले कर देना चाहिए । इसी में हमारा भला है । ' 

शिक्षा :- अच्छी सीख कहीं से भी मिल सकती है ।

लगन हे खजाना

।। लगन है खजाना ।।
 एक लुहार था । उसने बढ़ई के लिए एक हथौड़ा बनाया । हथौड़ा बहुत सुंदर और मजबूत था । बढ़ई को हथौड़ा बहुत पसंद आया । उसने सोचा क्यों न एक हथौड़ा और बनवा लिया जाए । उसने लुहार से कहा , ' एक और हथौड़ा बना दो लेकिन इस बार जो बनाना , वह पहले से भी अच्छा हो । तुम जितने दाम मांगोगे , मैं दूंगा । ' लुहार ने कहा , ' नहीं , यह नहीं हो पाएगा । ' बढ़ई ने पूछा , ' आखिर क्यों ? तुम्हें तो मुंह मांगी कीमत मिल रही है । ' लुहार ने कहा , ' बात कीमत की नहीं है । मैं जब कोई चीज बनाता हूं , तो पूरी लगन , योग्यता और ताकत लगा देता हूं । यह हथौड़ा बनाते समय भी मैंने ऐसा ही किया था । अब तुम ही बताओ कि मैं दूसरा हथौड़ा पहले से अच्छा कैसे बना सका हूं ? अगर मैं कहूं कि मैं ऐसा कर सकता हूं तो इसका अर्थ होगा कि मैंने पिछले काम में जरूर कसर छोड़ दी होगी । सही है न ? लुहार की बात सुन बढ़ई आवाक रह गया । इनकी बातें एक साधु सुन रहे थे । उन्होंने बढ़ई से कहा , ' इसने बहुत पते की बात की है । काम चाहे छोटा हो या बड़ा , हमें पूरे मनोयोग से करना चाहिए । श्रम की कीमत नहीं लगाई जा सकती । ' बढ़ई लज्जित हो गया । 

शिक्षा :- लगन सबसे बड़ा खजाना है । जितना बढ़ाओगे उतना बढ़ेगा ।

लोभ से रहें दूर

।। लोभ से रहें दूर ।।
 स्वामी दयानंद के भव्य और ' प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ओखी मठ के महंत ने उनसे कहा , ' दयानंद , यदि तुम मेरे शिष्य बन जाओ तो मेरे मठ की गद्दी के स्वामी बन जाओगे । तुम्हारे हाथों में लाखों की संपत्ति आ जाएगी । तुम महंत माने जाओगे और तुम्हें इतनी मान प्रतिष्ठा मिलेगी , जिसकी कोई बराबरी नहीं कर सकेगा । तुम स्वतंत्र और बेधड़क उस संसाधन को भोग सकते हो । कोई तुम्हें रोक - टोक नहीं करेगा । ' लेकिन धन आदि के प्रलोभनों से पूरी तरह मुक्त दयानंद को ऐसे प्रलोभन भला कहां बांध सकते थे ? धन को तिनके के समान समझने वाले दयानंद ने कहा , ' आपको धन्यवाद , लेकिन मेरे लिए यह संपत्ति व्यर्थ है । मेरे पिता द्वारा एकत्र की गई संपत्ति पूजा - पाखंड द्वारा एकत्र की गई आपकी संपत्ति से कहीं अधिक है । मैं उस अपार संपत्ति को भी लकड़ी , पत्थर , मिट्टी जैसा मानकर त्याग चुका हूं । ऐसे में भला यह महंत का पद मेरे लिए क्या अर्थ रखता है ? मेरे लिए इन भौतिक सुखों का कोई मतलब नहीं । मेरे जीवन का एक बड़ा लक्ष्य है और महंत का यह पद उसके सामने कहीं नहीं टिकता । आपका चेला बनना तो दूर , मैं ऐसे प्रलोभनों के पास जाना भी घातक समझता हूं । यह बात सुनकर महंत अवाक रह गए । 

शिक्षा :- अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाएं । प्रलोभनों में न फंसें ।

जीने का हक़

।। जीने का हक ।।
 एक राजा कई मुसीबतों से घिर गए । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इन आपदाओं को कैसे दूर करें ? वह रात - दिन चिंता में डूबे रहते । तभी एक दिन उनकी मुलाकात एक तांत्रिक से हुई । उन्होंने तांत्रिक को अपनी आपदाओं के बारे में बताया तो उसने राजा से कहा , ' संकटों से मुक्ति तभी मिलेगी , जब आप पशुओं की बलि चढ़ाएंगे । ' राजा ने उस तांत्रिक की बात पर विश्वास कर लिया और बलि देने की योजना बना ली । एक विशेष अनुष्ठान भी आयोजित करा लिया गया । बलि के लिए एक भैंसे को भी बांधकर खड़ा कर लिया गया । तभी संयोगवश गौतम बुद्ध वहां से गुजरे । उन्हें मूक पशु को मौत की प्रतीक्षा करते देखा तो उनका हृदय करुणा से भर उठा । उन्होंने राजा को एक तिनका देते हुए कहा , ' राजन , इस तिनके को तोड़कर दिखाएं । ' राजा ने फौरन तिनका तोड़ दिया । फिर उन्होंने राजा से उस तिनके को जोड़ने के लिए कहा । राजा ने कहा कि टूटा तिनका दोबारा कैसे जुड़ सकता है ? बुद्ध बोले , ' राजन , जब आप टूटा तिनका भी जोड़ नहीं सकते तो निरीह प्राणी की हत्या के बाद उसे जीवित भी नहीं कर सकेंगे । ' निरीह प्राणी को भी जीने का हक है । समस्याएं सुलझाने के लिए बुद्धि और साहस का प्रयोग करें । बुद्ध की बात सुन लज्जित राजा ने पशुवध बंद करवा दिए । 

शिक्षा :- पशुओं पर करुणा रखें ।

कहानी :- कला का छात्र

।। कला का छात्र ।।
 बंगाल के एक आर्ट कॉलेज में एक अमीर छात्र ने दाखिला लिया । वह रहन - सहन में बेहद लापरवाह था । हॉस्टल में उसका कमरा हमेशा गंदा रहता । उसकी  शिकायत प्राचार्य तक पहुंची , लेकिन कोई हल न निकला । एक दिन वह उठा तो उसे उसका कमरा साफ सुथरा मिला । ऐसा कई दिन तक हुआ । उसे लगा कि हॉस्टल के नौकर ने इनाम के लिए ऐसा किया होगा । उसने नौकर को बुलाया और कुछ पैसे देते हुए कहा - यह लो तुम्हारा इनाम । उसने पूछा - इनाम किस लिए ? तो छात्र बोला - क्योंकि तुम रोज मेरे कमरे की सफाई करते हो । नौकर ने कहा - मैं तो कभी आपके कमरे में गया ही नहीं । छात्र हैरान हो गया कि फिर सफाई किसने की ? इसका पता लगाने के लिए वह रात में देर तक जागा रहा और सोने का नाटक करता रहा । आधी रात को कोई उसके कमरे में आया और चीजें व्यवस्थित करने लगा । छात्र ने उठकर उसका हाथ पकड़ लिया । उसे देखते ही छात्र सन्न रह गया । वे कॉलेज के प्राचार्य थे । वह उनके पैरों में गिरकर माफी मांगने लगा । प्राचार्य ने कहा - तुम कलाकार बनने आए थे लेकिन कला के लिए निर्मल मन व सौंदर्य दृष्टि चाहिए जो तुममें नहीं है । मैं चाहता हूं तुम कम से कम अच्छे इंसान बनकर जाओ । 

शिक्षा :- फूहड़ता में कला का वास नहीं होता ।

कहानी :- शिक्षा का महत्त्व

।। शिक्षा का महत्त्व ।।
एक संत कहीं जा रहे थे । रास्ते में उन्होंने देखा कि एक वृद्ध सज्जन अपने हाथ में चिट्ठी लिए घूम रहे थे और सबसे उसे पढ़ने का निवेदन कर रहे थे । मगर लोग अपने - अपने कामों में इतना व्यस्त थे कि उस वृद्ध की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा था । चिट्ठी पढ़ना तो बहुत दूर की बात थी । एकाध व्यक्ति ने देखा भी तो मुंह बनाकर चला गया । वृद्ध की हालत देख संत से रहा नहीं गया । वह उसके पास पहुंचकर उससे बात करने लगे । वृद्ध ने उनसे भी चिट्ठी पढ़ने का अनुरोध किया । संत के साथ उनके एक शिष्य भी वहीं मौजूद थे । संत का संकेत पाकर शिष्य ने वृद्ध को चिट्ठी पढ़कर सुनाई । चिट्ठी पढ़वाने के बाद जब वृद्ध जाने लगा तो संत ने पूछा , ' बाबा , आप अपने घर के बच्चों को स्कूल भेजते हो या नहीं ? अगर आप अपने बच्चों को अभी भी नहीं पढ़ाएंगे तो भविष्य में आप ही की तरह उन्हें भी चिट्ठी पढ़वाने के लिए लोगों की मिन्नतें करनी पड़ेंगी । ' संत की बातें सुनकर वृद्ध ने कहा , ' महाराज , आज आपने मेरी आंखें खोल दी हैं । आपने मुझे शिक्षा की अहमियत बता दी है । मैं अपने बच्चों को तो पढ़ाऊंगा ही , साथ ही खुद भी पढ़ने की कोशिश करूंगा । ' इस पर संत ने कहा , ' आपका फैसला नेक है । पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती । ' 
शिक्षा :- पढ़ना - लिखना बेहद जरूरी है ।

कहानी :- मन की शांति

।। मन की शांति ।।
पुराने जमाने की बात है । एक राजा था । उससे मिलने एक भिक्षु आए । उस भिक्षु के उपदेशों से राजा बहुत प्रभावित हुआ । उसने भिक्षु से कहा , ' आपके चेहरे पर तो दिव्य शान्ति दिखाई दे रही है , क्या मुझे भी वह प्राप्त हो सकती है ? यदि हो सकती है तो मुझे इसके लिए क्या करना होगा ? मैं राजा होकर भी हमेशा अशांत रहता हूं । ' भिक्षु ने जवाब दिया , ' हां , बिल्कुल प्राप्त हो सकती है । मगर इसके लिए अकेले बैठकर चिंतन करना होगा । दूसरे दिन सुबह ही राजा राजमहल के एक कमरे में अपना आसन जमा कर बैठ गया । कुछ देर बैठा रहा लेकिन अकेले परेशान होने लगा । तभी एक कर्मचारी उधर सफाई के लिए आया । राजा उससे उसका हाल पूछने लगा । कर्मचारी अपनी तकलीफों के बारे में बताने लगा । कुछ देर बाद राजा राजमहल में घूमने गया तो अन्य कर्मचारियों की भी दुख - तकलीफें जानी । राजा ने अपने कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की और उनमें कपड़े आदि बांटे । शाम को फिर वही भिक्षु मिलने आए । उन्होंने पूछा - कुछ शांति मिली राजन् ? राजा ने कहा , ' महात्मन् , शांति तो नहीं मिली लेकिन लोगों के दुख दूर करने से मेरे मन की अशांति जरूर जाती रही है । ' भिक्षु ने कहा , ' आपने शांति का रास्ता खोज लिया है । इसी पर आगे बढ़े । 

शिक्षा :- दूसरों के दुख दूर करके असली शांति मिल सकती है ।

जैसे को तैसा

एक स्थान पर जीर्णधन नाम का बनिये का लड़का रहता था । धन की खोज में उसने परदेश जाने का विचार किया । उसके घर में विशेष सम्पत्ति तो थी नहीं, केव...