उज्जैन के राजा ने अपने जिद्दी व शरारती राजकुमार शातवाहन को गुरु शिवदास के आश्रम में शिक्षा के लिए भेजा । शिवदास राजकुमार की बुरी आदतों से परिचित हो गए थे । उन्होंने उसे सुधारने के लिए कई बार दंडित किया । वह अपने प्रयास में सफल रहे और राजकुमार के आचरण में बदलाव आ गया । इससे राजा बहुत खुश हुए । कुछ समय बाद शातवाहन सिंहासन पर बैठा । उधर , गुरु शिवदास की स्थिति दयनीय हो गई । वह वृद्ध हो गए और भिक्षा मांगकर पेट भरने लगे । एक दिन वह भिक्षा मांगते हुए राजा शातवाहन के पास पहुंच गए । अपने गुरु को देख शातवाहन के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव आए , लेकिन जल्द ही पुरानी बातें याद करके वह गुस्से से भर उठा । उसने कहा , ' याद है गुरुजी , आप मुझे कितना पीटते थे ? मझे देखिए , आज मैं कहां पहुंच गया और आप कहां रह गए । ' इस पर गुरु बोले , ' हां पुत्र , तुम सही कह रहे हो । मुझे तो तुम्हें एक सफल राजा के रूप में देखकर अत्यंत खुशी हो रही है । तुम मेरी शिक्षा व डांट से सही मार्ग पर आए थे और इसलिए आज प्रजा बेहद संतुष्ट है । यदि तुम पहले जैसे होते तो तुम्हारे राज्य में बहुत कष्ट होते । ' गुरु की बात सुन राजा बेहद शर्मिंदा हुआ और उनसे क्षमा मांगकर राजमहल में ले गया ।
शिक्षा :- गुरु हमें सन्मार्ग पर लाते हैं ।
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