Monday, 13 April 2020

लोभ से रहें दूर

।। लोभ से रहें दूर ।।
 स्वामी दयानंद के भव्य और ' प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ओखी मठ के महंत ने उनसे कहा , ' दयानंद , यदि तुम मेरे शिष्य बन जाओ तो मेरे मठ की गद्दी के स्वामी बन जाओगे । तुम्हारे हाथों में लाखों की संपत्ति आ जाएगी । तुम महंत माने जाओगे और तुम्हें इतनी मान प्रतिष्ठा मिलेगी , जिसकी कोई बराबरी नहीं कर सकेगा । तुम स्वतंत्र और बेधड़क उस संसाधन को भोग सकते हो । कोई तुम्हें रोक - टोक नहीं करेगा । ' लेकिन धन आदि के प्रलोभनों से पूरी तरह मुक्त दयानंद को ऐसे प्रलोभन भला कहां बांध सकते थे ? धन को तिनके के समान समझने वाले दयानंद ने कहा , ' आपको धन्यवाद , लेकिन मेरे लिए यह संपत्ति व्यर्थ है । मेरे पिता द्वारा एकत्र की गई संपत्ति पूजा - पाखंड द्वारा एकत्र की गई आपकी संपत्ति से कहीं अधिक है । मैं उस अपार संपत्ति को भी लकड़ी , पत्थर , मिट्टी जैसा मानकर त्याग चुका हूं । ऐसे में भला यह महंत का पद मेरे लिए क्या अर्थ रखता है ? मेरे लिए इन भौतिक सुखों का कोई मतलब नहीं । मेरे जीवन का एक बड़ा लक्ष्य है और महंत का यह पद उसके सामने कहीं नहीं टिकता । आपका चेला बनना तो दूर , मैं ऐसे प्रलोभनों के पास जाना भी घातक समझता हूं । यह बात सुनकर महंत अवाक रह गए । 

शिक्षा :- अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाएं । प्रलोभनों में न फंसें ।

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