एक था साधु और एक थी नर्तकी । साधु दिन भर उपदेश देता रहता और नर्तकी लोगों के सामने नाचकर उनका मन बहलाती थी । दोनों की मृत्यु लगभग एक ही साथ हुई । मरकर जब ये दोनों यमलोक पहुंचे तो इनके कर्मो और उनके पीछे छिपी भावनाओं के आधार पर इन्हें स्वर्ग या नरक दिए जाने की बात कही गई । साधु खुद को स्वर्ग मिलने को लेकर पूरा आश्वस्त था । वहीं नर्तकी अपने मन में ऐसा कुछ भी विचार नहीं कर रही थी । उसे इंतजार था तो सिर्फ फैसले का । तभी घोषणा हुई कि साधु को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है । इस फैसले से आहत साधू ने यमराज से क्रोधित होते हुए सवाल किया , ' यह कैसा न्याय है ? मैं जीवन भर लोगों को उपदेश देता रहा और मुझे नरक मिला ? जबकि यह स्त्री जीवन भर लोगों को रिझाने के लिए नाचती रही और इसे स्वर्ग दिया जा रहा है ? ऐसा क्यों ? ' यमराज ने शांतभाव से उत्तर दिया , ' यह नर्तकी अपना पेट भरने के लिए नाचती थी लेकिन इसके मन में यही भावना थी कि मैं इस नृत्य को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रही हूं । जबकि तुम उपदेश देते हुए भी यह सोचते थे कि इस संन्यास को कुछ समय बाद लेता तो उस नर्तकी का नृत्य देख पाता । यहां फैसले में तुम्हारे कर्मों से ज्यादा भावनाएं भारी पड़ी हैं । ' |
शिक्षा :- किसी भी काम को करते समय आपकी भावना का विशेष महत्व है ।
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